किनारे बनाम लहरें
Written by: शशि सिंह | June 15, 2005 | Category: तन्हा जब होता हूं | Comment
लहरें
किनारों का अपना अहं है… लेकिन लहरों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. ये तो अठखेलियां करते… किनारों के बीच से अपनी ही धुन में बढ़े चले जाते हैं. एक वक्त… एक गहराई… एक समंदर… जहां किनारों का कोई जोर नहीं, सिर्फ लहरें ही लहरें… चारों ओर लहरें… और किनारे? इस भरम में जीते हैं कि उसने लहरों को बांध रखा है. हकीकत तो यह है कि मगरूर किनारों में इतना जोर नहीं कि वे लहरों में चार कदम उतर कर देखें… डूबने का खतरा जो है. चढ़ती-उतरती लहरों की ताकत है उनकी लय… उनका रिद्म… जिसे आजतक न कोई किनारा तोड़ पाया है और न कभी तोड़ पाएगा.
वैसे किनारों का भी दर्द कुछ कम नहीं… जरा इनके दर्द पर गौर फरमाइये
साहिल
बहते दरिया के मौजों ने की हंसी
न जाना खिलखिलाहट ने दर्द-ए-साहिल
ये इश्क भी कैसा
कि… दीदार का तो इकरार है
पर… ताउम्र न मिलने की इक कसम
मौजों से कह दो
कह दो कि दरिया की गहराई का गुरूर न करे
ग़म-ए-आशिकी में साहिल के अश्क़ इतने बह जाएंगे
कि… दरिया दुजा बहता देख
मौजें भी शर्मसार हो जाएंगी
बनकर खुद साहिल
साहिल की आशिकी को अंजाम तक पहुंचाएंगी
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