मुंबईवासी होने पर गर्व महसूस हुआ…


Written by: शशि सिंह | July 13, 2006 | Category: सलाम ठोकता हूं | Comment 

यह महज़ एक संयोग है कि दफ्तर में हुई देरी की वजह से मैं उन सात ट्रेनों में किसी में नहीं था, नहीं तो क्या होता? इस कल्पना भर से दिल बैठा जा रहा है. साथ ही उन अभागों के लिए आंखे नम हैं जो मेरे सहयात्री हुआ करते थे.

उस दिन कहाँ तो इस बात की योजना बना रहा था कि आज पत्नी अलका के जन्मदिन पर उसे क्या तोहफ़ा दिया जाए… मगर शाम तक यह मंगलवार पूरी मुम्बई के लिए अमंगलकारी हो चुका था.

विस्फोटों की ख़बर जंगल में आग की तरह फैली, दफ्तर में हमारे बॉस ने यथाशीघ्र घर जाने का निर्देश दे दिया. लेकिन टेलीविजन पर ट्रेन सेवा के पूरी तरह ठप होने की ख़बरें आ रही थीं.

चिंता इस बात की थी कि अंधेरी में अपने ऑफ़िस से मीरा रोड अपने घर कैसे पहुंच पाऊंगा? तभी मेरे साथ एक और संयोग हुआ, मेरा छोटा भाई (जिसका कभी कभार ही मेरे दफ़्तर की तरफ़ आना होता है) अपनी मोटरसाइकिल लेकर किसी काम से मेरे दफ्तर के पड़ोस में आया हुआ था.

दोनों भाई अंधेरी लिंक रोड से गोरेगांव एसवी रोड होते वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे की तरफ बढ़ें. सड़कों पर भीड़ बड़ी तेजी से बढ़ रही थी, जल्दी ही सड़कों पर क्षमता से बहुत अधिक वाहन थे.

हर किसी के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था, सिग्नल पर लोग-दूसरे से सूचनाओं का आदान-प्रदान कर खुद को अपडेट करने की कोशिश कर रहे थे क्योंकि विस्फोटों के आधे-पौने घंटे तक सभी फोन सेवाएं जाम कर दी गईं थीं.

बाद में भी काफ़ी मशक्कत के बाद भी एक्के-दूक्के कॉल ही लग पा रहे थे.

मुंबईवासी होने पर गर्व

सड़कों पर लोकल ट्रेनों के विकल्प बेस्ट की बसों की संख्या भी अचानक कम हो गई. बीच-बीच में बादल भी बरस कर मौजूदगी जता रहे थे.

इन सारी मुश्किलों के बाद भी सड़कों पर जो नज़ारा था उसे देखकर अपने मुंबईवासी होने पर गर्व महसूस हो रहा है.

आम दिनों में ट्रैफ़िक में फंसे होने पर होने वाली झुंझलाहट बिल्कुल नदारत थी. लोग एक-दूसरे की मदद करते देखे जा सकते थे.

मोटरसाइकिल, रिक्शा, टेंपो, ट्रक, बस और यहां तक की शान से बड़ी-बड़ी कारों में अकेले चलने वाले लोग भी पैदल चलने वालों को रुक-रुककर लिफ़्ट देते दिख रहे थे.

हर सिग्नल पर ट्रैफ़िक पुलिस की मुस्तैदी भी क़ाबिले तारीफ़ थी. दहिसर टोल नाका पर स्थानीय प्रशासन द्वारा टोल टैक्स की वसूली स्थगित करना लोगों को अच्छा लगा.

इस बीच इक्के-दुक्के ही सही पर सलामती पूछने वाले फोनों का सिलसिला लगातार जारी था, शायद किसी एक दिन में मेरे लिए यह सबसे अधिक कॉल थे. यह बात मेरे दिल को छू गई.

खैर, आधे घंटे का हमारा सफ़र तीन घंटे में पूरा हुआ. घर के दरवाज़े पर मुझे सही सलामत देखना अलका के लिए जन्मदिन का सबसे बड़ा तोहफा था.

(बीबीसी हिन्दी में पूर्व प्रकाशित)

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