ख़बरें जो बेख़बर नहीं होने देतीं


Written by: शशि सिंह | January 2, 2007 | Category: सलाम ठोकता हूं | 2 Comments 

ऐसा कम ही होता है कि आजतक (वो अपना सबसे तेज़) न्यूज़ चैनल कभी पते बात करे. वह दुर्लभ नजारा मुझे साल 2007 के पहले दिन ही देखने को मिल गया. वो ऐसा शायद इसलिए हो पाया होगा कि पहली जनवरी होने की वजह से बॉसेस छूट्टी पर होंगे और न्यूज़ रूम में अपने नीरज दीवान भाई जैसे टीवी के दबे-कुचले पत्रकारों को अपनी पत्रकारिता दिखाने का मौका मिल गया होगा.

खैर, जब हमारे धर्म भाई जोश में आ ही गये तो जरा उनके बहादूरी (पत्रकारिता) की भी चर्चा कर ली जाये. कल रात उनका कार्यक्रम था प्राइम टाइम शो दस्तक और कार्यक्रम की एंकरिंग कर रहे थे अपने दौर के कुछेक काबिल लोगों में से एक पुण्य प्रसुन वाजपेयी. इस कार्यक्रम को जिस अंदाज में पेश किया गया… जिन मुद्दों की चर्चा की गई वाकई काबिले तारिफ है. जो ख़बरों के धंधे से जुड़े हैं वे बहुत अच्छी तरह समझ सकते हैं कि आज चैनलों पर बेहुदगी के दौर में वहां से कुछ संवेदनशील बात कह पाना कितना मुश्किल हैं. कार्यक्रम में बड़े संजीदा अंदाज में आज के भारत की तस्वीर दिखाने की कोशिश की गई. इसके लिए उन्होंने माध्यम बनाया तीन ख़बरों को.

पहिले ये तीन ख़बरें:-

  • नोयडा में अगवा बच्चों के साथ दुराचार और फिर उनकी हत्या वाले मामले में पुलिस के प्रति गुस्साये ग्रामीणों द्वारा पथराव
  • 31 दिसम्बर की रात किसी पार्टी में मल्लिका सेहरावत ने 50 मिनट ठूमके लगाये एवज में उन्हें 50 लाख रुपये मिले. यानी एक मिनट के लिए एक लाख
  • दिल्ली हवाई अड्डे पर कोहरे की वजह से विमान सेवायें पूरी तरह से अस्त-व्यस्त. गोया मंत्रीजी का बयान कि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए जरूरी उपकरण और प्रशिक्षण के लिए होने वाला खर्च उठाने में सरकार अक्षम है.

इन ख़बरों के मायने

पहली ख़बर,
आज पुलिस नाम की संस्था से जनता का विश्वास पूरी तरह से डोलने लगा है. वह अपने इन रक्षकों को उनके विपरीत भूमिकाओं में देखकर सदमें में हैं. जो किसी भी व्यवस्था के लिए शुभ नहीं है.

दूसरी ख़बर,
आज देश में ऐसा भी एक वर्ग कुकुरमुत्तों की तरह पसारता जा रहा है. जिसे दूसरों की तकलीफ में दर्द नहीं होता. अलबत्ता अपने भोग के लिए पैसा पानी की तरह बहाने में इसे कोई गुरेज नहीं… और न ही इसमें उसे कोई बुराई दिखती है.

तीसरी ख़बर,
एक तरफ तो चंद लोग चंद ठूमकों के लिए मिनटों में लाखों लूटा रहे हैं वहीं सरकार बेबस है कि उसके पास अपने निवासियों की सुविधा के लिए खर्चने को रुपये नहीं हैं.

इन ख़बरों से जो सवाल उभरते हैं वो आज हर संवेदनशील भारतीय को विचारने योग्य है. क्या ये तीनों ख़बर एक ही देश की हैं? या फिर तरक्की की राह पर बढ़ने का दावा कर रहा हमारा देश किसी मानसिक रोग से ग्रस्त है? अगर इन सवालों का जवाब नहीं तलाशा गया तो निश्चित रूप से हम एक बीमार राष्ट्र के कुंठित निवासी बनकर रह जायेंगे.

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Comments

2 Responses to “ख़बरें जो बेख़बर नहीं होने देतीं”

  1. संजय बेंगाणीNo Gravatar on January 3rd, 2007 11:59 am

    “गोया मंत्रीजी का बयान कि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए जरूरी उपकरण और प्रशिक्षण के लिए होने वाला खर्च उठाने में सरकार अक्षम है. ”
    मगर बद अक्कल लोगो हमारा निजीक्षेत्र सक्षम है. निजीकरण कर दो, काहे टाँग अड़ा रहे हो.

    [Reply]

  2. TarunNo Gravatar on January 3rd, 2007 12:05 pm

    अभी देख रहा था गांव वालों का मुंह बंद करने के लिये कैसे जल्दी जल्दी में २ लाख रूपये दे रही थी सरकार, यहां तक की एकाउंट नंबर लिखना भी भूल गये। यानि की गरीब के बच्चे की जान की कीमत २ लाख और मलिक्का के एक ठुमके की कीमत एक लाख।

    [Reply]

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