इंडियन पॉलिटिकल लीग: फोटो कॉपी बनाम ओरिजनल


Written by: शशि सिंह | May 17, 2009 | Category: ढाक के तीन पात | 3 Comments 

indiavoteग्रेट इंडियन पॉलिटिकल लीग का फाइनल संपन्न हुआ। नतीजों से पहिले कहां तो फोटो फिनिश की उम्मीद लगाई जा रही थी मगर कांग्रेसी बालक राहुल बाबा के मुकाबले भाजपा का बुजुर्गवार नेतृत्व न सिर्फ अक्षम नज़र आया बल्कि हांफता हुआ काफी पीछे छूट गया। कठपुतली प्रधानमंत्री मजबुत नेता पर निर्णायक रूप से भारी पड़ते हुये एक बार फिर से सरकार बनाने जा रहे हैं।

कांगेसनीत गठबंधन को जीत की बधाई! मगर इसे कांगेस की जीत से ज्यादा मैं भाजपा की हार मानता हूं। चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भाजपा अपने ही तीनों “च” के सामने चारों खाने चित्त है। सन 1992 के बाद से ही पार्टी लगातार अपनी चालें गलत चल रही है। 1998 में सत्ता में आने के बाद इसके चरित्र में कितना नकारात्मक बदलाव आया यह किसी से छूपा नहीं है। रही बात चेहरे की तो सर्वमान्य अटल बिहारी वाजपेयी के बाद पार्टी में एक भी नेता ऐसा नहीं है जिसकी पीठ पर खंजर और चेहरे पर नाखूनों के निशान न हों।

भारत की मजबूत पहचान और अस्मिता की ऐतिहासिक गौरव को फिर से हासिल करने की जनमानस के चिरपरिचित सपने को पूरा करने का वादा किया। एक देश एक कानून (समान संहिता), कश्मीर को लगभग एक राष्ट्र का दर्ज़ा देने वाला कानून (धारा 370) और रामराज्य के मुद्दे को अपने एजेंडे में शामिल किया। रामराज्य के नारे ने तो इतना असर किया रामराज्य की आस में महात्मा गांधी के समय से ही कांग्रेस के साथ रहे मतदाता भी भाजपा से जुड़ते गये। भारतीय राजनीति में यह एक नई तरह की लहर थी। राजनीतिक रूप से अछूत होते हुये भी भाजपा बड़ी तेजी से राष्ट्रीय स्वरूप अख़्तियार कर रही थी।

इस लहर से जो जोश पैदा हुआ उसके आवेश में अयोध्या में विवादित ढांचा भाजपा ने गिरा दिया। इससे स्थापित मान्याताओं को चुनौती मिली… लिहाजा संघर्ष लाजिमी था। आजादी के बाद भी बंटवारे के बावजूद देश में हर दो-एक साल के अंतराल पर छोटे-बड़े मजहबी दंगे होते रहते थे मगर इस बार प्रतिक्रिया ज्यादा तीव्र थी। इसका अंदाजा शायद भाजपा को भी नहीं था। अचानक ये पार्टी लाइम टाइट आ गई। लेकिन इसका दवाब ये झेल नहीं सकी और “राम” के जिस नारे में ये अपना अस्तित्व देखती थी उसी को लेकर अब वो अपोलोजेटिक हो गई। शायद उसे अपने संभावित विस्तार में अपनी सर्वग्राह्यता के लिये जरूरी लगा।

यही भाजपा की सबसे बड़ी भूल थी जिसने आने वाले समय में उसके कांग्रेसीकरण का मार्ग प्रशस्त किया। भाजपा से सबसे बड़ी शिकायत ही इस बात को लेकर है कि उसे या तो विवादित ढांचे को गिराना नहीं था और जब गिरा दिया तो फिर उसके लिए शर्मसार होने की जरूरत नहीं थी। वह लाख नाक रगड़ ले देश का एक खास समुदाय उसे कभी वोट देने वाला नहीं है। उन्हें रिझाने की उसकी कोशिशों ने उन लोगों को शर्मसार कर दिया जो एक नई तरह की व्यवस्था के लिए उसके पीछे लामबंध हो रहे थे।

यानी चुनाव दर चुनाव भाजपा वही करती दिखी जिसकी वजह से लोग कांग्रेस से ख़फा थे। देश पर राज करने वाली पार्टी कांग्रेस का विकल्प बनने के चक्कर में भाजपा उसकी की फोटो कॉपी बन गई। अब आप ही बताइये जब हाथ ये फोटो कॉपी ही लगनी थी तो ओरिजनल कांग्रेस भला क्या बुरा है?

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Comments

3 Responses to “इंडियन पॉलिटिकल लीग: फोटो कॉपी बनाम ओरिजनल”

  1. samarendraNo Gravatar on May 17th, 2009 5:04 pm

    सच में आज बीजेपी कांग्रेस की फोटोकॉपी बन कर रह गई है। ऐसी फोटोकॉपी जिस पर कालिख पुती है। साम्प्रदायिकता की कालिख। गुजरात दंगों की कालिख। समाज को बांटने की कालिख। जनता ने आडवाणी को ठुकरा कर बता दिया है कि वो चाहे कितना भी नाटक करें उन्हें माफी नहीं मिलेगी। बीजेपी को इससे सबक लेना चाहिये।

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    अमिताभ त्रिपाठीNo Gravatar Reply:

    समरेन्द्र जी ने जो बात कही है उस पर मुझे असहमति है। जनता ने आडवाणी को इसलिये नहीं ठुकराया कि उन्हें माफी नहीं मिल सकती बल्कि इसलिये ठुकराया कि उन्होंने माफी माँगी। आखिर माफी क्यों माँगी। यदि साम्प्रदायिकता से आपका आशय 6 दिसम्बर 1992 है तो इस घटना के बाद तो जनता ने भाजपा को 1996 में देश का सबसे बडा दल बनाया फिर 1998 और 1999 में और अधिक जनादेश दिया। जहाँ तक गुजरात दंगों की बात है तो 2002 से आज तक तो वहाँ मीडिया के खलनायक मोदी ही राज कर रहे हैं और यदि इस चुनाव में गुजरात दंगों पर जनता नाराज होती तो उस राज्य में भाजपा की सीटें न बढ्तीं।

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  2. nirmla.kapilaNo Gravatar on May 17th, 2009 6:05 pm

    agar uski photocopy hi ban bati tab tak bhi sahi thaa ye to kuchh bhi nahi ban saki jis parivar ko koste huye logon ko bhadkati rahi us parivar ke logon ke kandhon par chadh kar naya paar lagane se bhi nahi chooki so varun baba hi le doobe

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