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आपने मुझ नाचीज में रुचि दिखाई, अच्छा लगा। अपना तो ऐसा है कि लेखनी ने टेलीविजन पर मायावी दुनिया गढ़ने से लेकर पत्रकारिता में दुनिया की हकीकत बयां करने तक का सफर तय किया है। अब खुद को न्यू मीडिया के खांचे में पाता हूं। पत्रकारिता की मुख्यधारा छूट चुकी है लेकिन न तो मीडिया से नाता टूटा है और न ही खुद को पत्रकार कहना छोड़ा है।
इन दिनों मुम्बई में एक बड़ी बहुराष्ट्रीय टेलीकॉम कंपनी में मैनेजरी कर रहा हूं। यहां अपनी भूमिका मोबाइल पर मूल्य वर्धित सेवाओं (Value Added Services) के लिए उपयोगी बॉलीवुड और क्षेत्रीय भाषाओं की सामग्री की पहचान और विकास की जिम्मेदारी है। वैसे ये काम भी मीडिया से जुड़ा है लेकिन थोड़े अलग मिजाज का है… जिसको समझने की कोशिश में हूं।
कर्मभूमि मुम्बई है लेकिन जड़े झारखंड के कोयला खदानों से होती हुई बिहार में सरयू नदी के तीर तक जाती है। भोजपुरी, नागपुरी व हिंदी मेरी कमजोरी… न… न… मेरी ताकत हैं. बच्चे मुझे बेहद पसंद हैं. उनकी एक मुस्कान मेरे लिए भारी से भारी तनाव में रामवाण साबित होता है. शायद भगवान ने इसीलिए एक प्यारे से बेटे वेदांत और एक बिटिया वेदिका का बाप बना दिया है. घर में बच्चों की मां, मेरे माता-पिता और दो छोटे भाई हैं. बस हो गया यार… अब और क्या जानना चाहते हो? मेरे बारे में ज्यादा जानना हो या मुझसे बतियाना हो तो नीचे कॉंटेक्ट फार्म में अपना संदेश छोड़ सकते हैं… मुझे अच्छा लगेगा। बात दिल को छू गई तो मेलजोल तय समझिये।
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