प्रधानमंत्री बनना अभी पैंडिग में है


Written by: शशि सिंह | December 29, 2006 | Category: हंसी-ठिठोली | 3 Comments 
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मैं अपने किसी योजना का खुलासा नहीं कर रहा हूं… ये तो हमारे माननीय रेलमंत्री श्री लालू प्रसाद यादवजी का मामला है. जी हां ये वही लालू जी हैं जो बिहार में 15 साल तक अपने (पत्नी का भी) ‘कु’शासन के लिए कुख्यात रहे हैं इन दिनों रेलमंत्री के रूप में खूब नाम कमा रहे हैं. भले ही नीतिश कुमार कहते फिरें कि रेलवे की ये सलफता उनकी मेहनत का नतीजा है पर आज सच तो यही है कि कामयाबी के सेहरे का कपड़ा लालू ले उड़े हैं और अपनी मर्जी से अलग-अलग डिजाइन का सेहरा पहन रहे हैं.


यादों के घरौंदे में एक सोनचिरैया


Written by: शशि सिंह | August 14, 2006 | Category: बीती ताही विसरत नाही | Comment 
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लंबी बीमारी ने पत्रकार, गीतकार, कवियत्री और लेखिका सुमन सरीन के शरीर को जर्जर तो पहले ही कर दिया था शायद उस दिन मन ने भी हथियार डाल दिया होगा। अपने घरौंदे के गिर्द रहना चाह्ती थीं उस दिन, तभी तो पति की बांह पकड़ दफ्तर जाने से रोक लिया। उनके पति यानी नवभारत टाइम्स में वरिष्ठ पत्रकार कैलाश सेंगर के मन में अपनी सुमन को लेकर की विदाई की शंका हुई।


सोचा न था यूं होगी हमारी दूसरी मुलाकात


Written by: शशि सिंह | August 1, 2006 | Category: बीती ताही विसरत नाही | Comment 
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अभी कुछ महीने ही हुये थे मुझे और रघुनाथ को नवभारत टाइम्स ज्वाइन किये हुए. संपादक महोदय की शानदार 38 साल की पारी के बाद उनका विदाई समारोह था. वहीं हुई थीं सुमनजी से हमारी पहली मुलाकात. हमारे लिए बड़े भाईतुल्य उनके पति कैलाश सेंगर ने उनसे मेरा और रघुनाथ सरन का परिचय कराया.


मुंबईवासी होने पर गर्व महसूस हुआ…


Written by: शशि सिंह | July 13, 2006 | Category: सलाम ठोकता हूं | Comment 
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यह महज़ एक संयोग है कि दफ्तर में हुई देरी की वजह से मैं उन सात ट्रेनों में किसी में नहीं था, नहीं तो क्या होता? इस कल्पना भर से दिल बैठा जा रहा है. साथ ही उन अभागों के लिए आंखे नम हैं जो मेरे सहयात्री हुआ करते थे. उस दिन कहाँ तो इस बात की योजना बना रहा था कि आज पत्नी अलका के जन्मदिन पर उसे क्या तोहफ़ा दिया जाए… मगर शाम तक यह मंगलवार पूरी मुम्बई के लिए अमंगलकारी हो चुका था.


सवेरा होगा


Written by: शशि सिंह | December 18, 2005 | Category: तन्हा जब होता हूं | Comment 
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कुछ दूर, नहीं बहुत पास
कुछ है, कुछ है वहां
एक आकृति कुछ धुंधली-सी
इधर ही आती
नहीं, मैं ही चलूं वहां
देखूं तो क्या वही है
जिसकी है तलाश मुझे


हम फिल्में क्यों देखते हैं?


Written by: शशि सिंह | December 1, 2005 | Category: फिलिमची मनवा, बीती ताही विसरत नाही | Comment 
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हम फिल्में क्यों देखते हैं? जाहिर सी बात है फिल्में बनती हैं,इसलिए हम फिल्में देखते हैं। यकीन मानिये अगर फिल्में नहीं बनतीं तो हम कुछ और देखते। मसलन, कठपुतली का नाच, तमाशा, जात्रा, नौटंकी, रामलीला या ऐसा ही कुछ और। खैर सौभाग्य या दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है, इसलिए हम फिल्में देखते हैं। फिल्में देखने की बात चली तो याद आता है वो दिन जब मैंने सिनेमाघर में पहली फिल्म देखी। सिनेमा का वह मंदिर था,रामगढ़ का राजीव पिक्चर पैलेस।

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