हम फिल्में क्यों देखते हैं?


Written by: शशि सिंह | December 1, 2005 | Category: फिलिमची मनवा, बीती ताही विसरत नाही | Comment 
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हम फिल्में क्यों देखते हैं? जाहिर सी बात है फिल्में बनती हैं,इसलिए हम फिल्में देखते हैं। यकीन मानिये अगर फिल्में नहीं बनतीं तो हम कुछ और देखते। मसलन, कठपुतली का नाच, तमाशा, जात्रा, नौटंकी, रामलीला या ऐसा ही कुछ और। खैर सौभाग्य या दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है, इसलिए हम फिल्में देखते हैं। फिल्में देखने की बात चली तो याद आता है वो दिन जब मैंने सिनेमाघर में पहली फिल्म देखी। सिनेमा का वह मंदिर था,रामगढ़ का राजीव पिक्चर पैलेस।


नवरात्र माहात्म्य


Written by: शशि सिंह | October 9, 2005 | Category: सवाल आस्था का है | Comment 
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हिन्दू पंचागके अनुसार आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदा तिथिको नवरात्रिका आरम्भ होता है. शरद ऋतुमें होने के कारण इसे शारदीय नवरात्र भी कहा जाता है. ‘मारकण्डेय पुराण’ अध्याय 89 श्लोक 11 में कहा भी गया है कि ‘शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी’ और ‘निर्णयसिन्धु’ नामक धार्मिक विवादोंका समाधान करने वाला ग्रंथ भी यही मानता है. परंतु संस्कृतके प्रसिद्ध वैयाकरण नागोजी भट्टने ‘वार्षिकी’ को वासंती नवरात्र बोधक कहा है. ‘निर्णयामृत’ और ‘समय मयूख’ जैसे ग्रंथ भी इसका समर्थन करते हैं.


बेवफाई


Written by: शशि सिंह | June 25, 2005 | Category: तन्हा जब होता हूं | Comment 
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इश्क का सफर ये कैसा ना शुरू की ख़बर ना आखिर का गुमां हो रास्ते में आपका साथ था बस यही एक अरमां सुना था… हर रिश्ते का जरूरी होता है इक नाम आप माशूक हैं हमारे हमने भी कह डाला सरेआम पड़ते ही नाम हुआ ये अंजाम कि बाकी है अब पकड़ना महज इक [...]


किनारे बनाम लहरें


Written by: शशि सिंह | June 15, 2005 | Category: तन्हा जब होता हूं | Comment 
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लहरें किनारों का अपना अहं है… लेकिन लहरों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. ये तो अठखेलियां करते… किनारों के बीच से अपनी ही धुन में बढ़े चले जाते हैं. एक वक्त… एक गहराई… एक समंदर… जहां किनारों का कोई जोर नहीं, सिर्फ लहरें ही लहरें… चारों ओर लहरें… और किनारे? इस भरम में जीते [...]


खाली हाथ


Written by: शशि सिंह | June 13, 2005 | Category: तन्हा जब होता हूं | Comment 
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न देख इन हाथों को
इस कदर हिकारत से
गर मिल जाए एक पत्थर भी इसे
भगवान बना देते हैं
सजदा करता है तू जिन जवाहरात का
कभी पड़े थे इन्हीं हाथों में एक पत्थर की तरह


विक्षिप्त है वर्तमान


Written by: शशि सिंह | June 10, 2005 | Category: तन्हा जब होता हूं | Comment 
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विक्षिप्त है वर्तमान
बता इतिहास किसने किया इसका अपमान
जन्मा तो यह तेरे ही कोख से
था मासूम, अबोध, नादान
आह्लादित था भविष्य देख इसकी मुस्कान
विक्षिप्त है वर्तमान

इतिहास कहता है:

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