यादों के घरौंदे में एक सोनचिरैया
Written by: शशि सिंह | August 14, 2006 | Category: बीती ताही विसरत नाही | Comment
लंबी बीमारी ने पत्रकार, गीतकार, कवियत्री और लेखिका सुमन सरीन के शरीर को जर्जर तो पहले ही कर दिया था शायद उस दिन मन ने भी हथियार डाल दिया होगा। अपने घरौंदे के गिर्द रहना चाह्ती थीं उस दिन, तभी तो पति की बांह पकड़ दफ्तर जाने से रोक लिया। उनके पति यानी नवभारत टाइम्स में वरिष्ठ पत्रकार कैलाश सेंगर के मन में अपनी सुमन को लेकर की विदाई की शंका हुई।
सोचा न था यूं होगी हमारी दूसरी मुलाकात
Written by: शशि सिंह | August 1, 2006 | Category: बीती ताही विसरत नाही | Comment
अभी कुछ महीने ही हुये थे मुझे और रघुनाथ को नवभारत टाइम्स ज्वाइन किये हुए. संपादक महोदय की शानदार 38 साल की पारी के बाद उनका विदाई समारोह था. वहीं हुई थीं सुमनजी से हमारी पहली मुलाकात. हमारे लिए बड़े भाईतुल्य उनके पति कैलाश सेंगर ने उनसे मेरा और रघुनाथ सरन का परिचय कराया.
हम फिल्में क्यों देखते हैं?
Written by: शशि सिंह | December 1, 2005 | Category: फिलिमची मनवा, बीती ताही विसरत नाही | Comment
हम फिल्में क्यों देखते हैं? जाहिर सी बात है फिल्में बनती हैं,इसलिए हम फिल्में देखते हैं। यकीन मानिये अगर फिल्में नहीं बनतीं तो हम कुछ और देखते। मसलन, कठपुतली का नाच, तमाशा, जात्रा, नौटंकी, रामलीला या ऐसा ही कुछ और। खैर सौभाग्य या दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है, इसलिए हम फिल्में देखते हैं। फिल्में देखने की बात चली तो याद आता है वो दिन जब मैंने सिनेमाघर में पहली फिल्म देखी। सिनेमा का वह मंदिर था,रामगढ़ का राजीव पिक्चर पैलेस।





