Written by:
शशि सिंह
closeAuthor: शशि सिंह
Name: Shashi Singh
Email: shashikumarsingh@gmail.com
Site: http://shashisingh.in
About: इन दिनों मुम्बई में एक बड़ी बहुराष्ट्रीय टेलीकॉम कंपनी में मैनेजरी कर रहा हूं। यहां अपनी भूमिका मोबाइल पर मूल्य वर्धित सेवाएं (Value Added Services) के लिए उपयोगी बॉलीवुड और क्षेत्रीय भाषाओं की सामग्री की पहचान और विकास की जिम्मेदारी है। वैसे ये काम भी मीडिया से जुड़ा है लेकिन थोड़े अलग मिजाज का है… जिसको समझने की कोशिश में हूं।See Authors Posts (18)
| December 18, 2005 |
Category:
तन्हा जब होता हूं |
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कुछ दूर, नहीं बहुत पास
कुछ है, कुछ है वहां
एक आकृति कुछ धुंधली-सी
इधर ही आती
नहीं, मैं ही चलूं वहां
देखूं तो क्या वही है
जिसकी है तलाश मुझे
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| June 25, 2005 |
Category:
तन्हा जब होता हूं |
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इश्क का सफर ये कैसा ना शुरू की ख़बर ना आखिर का गुमां हो रास्ते में आपका साथ था बस यही एक अरमां सुना था… हर रिश्ते का जरूरी होता है इक नाम आप माशूक हैं हमारे हमने भी कह डाला सरेआम पड़ते ही नाम हुआ ये अंजाम कि बाकी है अब पकड़ना महज इक [...]
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| June 15, 2005 |
Category:
तन्हा जब होता हूं |
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लहरें किनारों का अपना अहं है… लेकिन लहरों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. ये तो अठखेलियां करते… किनारों के बीच से अपनी ही धुन में बढ़े चले जाते हैं. एक वक्त… एक गहराई… एक समंदर… जहां किनारों का कोई जोर नहीं, सिर्फ लहरें ही लहरें… चारों ओर लहरें… और किनारे? इस भरम में जीते [...]
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| June 13, 2005 |
Category:
तन्हा जब होता हूं |
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न देख इन हाथों को
इस कदर हिकारत से
गर मिल जाए एक पत्थर भी इसे
भगवान बना देते हैं
सजदा करता है तू जिन जवाहरात का
कभी पड़े थे इन्हीं हाथों में एक पत्थर की तरह
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| June 10, 2005 |
Category:
तन्हा जब होता हूं |
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विक्षिप्त है वर्तमान
बता इतिहास किसने किया इसका अपमान
जन्मा तो यह तेरे ही कोख से
था मासूम, अबोध, नादान
आह्लादित था भविष्य देख इसकी मुस्कान
विक्षिप्त है वर्तमान
इतिहास कहता है:
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