Written by:
शशि सिंह
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Name: Shashi Singh
Email: shashikumarsingh@gmail.com
Site: http://shashisingh.in
About: इन दिनों मुम्बई में एक बड़ी बहुराष्ट्रीय टेलीकॉम कंपनी में मैनेजरी कर रहा हूं। यहां अपनी भूमिका मोबाइल पर मूल्य वर्धित सेवाएं (Value Added Services) के लिए उपयोगी बॉलीवुड और क्षेत्रीय भाषाओं की सामग्री की पहचान और विकास की जिम्मेदारी है। वैसे ये काम भी मीडिया से जुड़ा है लेकिन थोड़े अलग मिजाज का है… जिसको समझने की कोशिश में हूं।See Authors Posts (18)
| December 1, 2005 |
Category:
फिलिमची मनवा,
बीती ताही विसरत नाही |
Comment
हम फिल्में क्यों देखते हैं? जाहिर सी बात है फिल्में बनती हैं,इसलिए हम फिल्में देखते हैं। यकीन मानिये अगर फिल्में नहीं बनतीं तो हम कुछ और देखते। मसलन, कठपुतली का नाच, तमाशा, जात्रा, नौटंकी, रामलीला या ऐसा ही कुछ और। खैर सौभाग्य या दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है, इसलिए हम फिल्में देखते हैं। फिल्में देखने की बात चली तो याद आता है वो दिन जब मैंने सिनेमाघर में पहली फिल्म देखी। सिनेमा का वह मंदिर था,रामगढ़ का राजीव पिक्चर पैलेस।
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| October 9, 2005 |
Category:
सवाल आस्था का है |
Comment
हिन्दू पंचागके अनुसार आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदा तिथिको नवरात्रिका आरम्भ होता है. शरद ऋतुमें होने के कारण इसे शारदीय नवरात्र भी कहा जाता है. ‘मारकण्डेय पुराण’ अध्याय 89 श्लोक 11 में कहा भी गया है कि ‘शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी’ और ‘निर्णयसिन्धु’ नामक धार्मिक विवादोंका समाधान करने वाला ग्रंथ भी यही मानता है. परंतु संस्कृतके प्रसिद्ध वैयाकरण नागोजी भट्टने ‘वार्षिकी’ को वासंती नवरात्र बोधक कहा है. ‘निर्णयामृत’ और ‘समय मयूख’ जैसे ग्रंथ भी इसका समर्थन करते हैं.
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| June 25, 2005 |
Category:
तन्हा जब होता हूं |
Comment
इश्क का सफर ये कैसा ना शुरू की ख़बर ना आखिर का गुमां हो रास्ते में आपका साथ था बस यही एक अरमां सुना था… हर रिश्ते का जरूरी होता है इक नाम आप माशूक हैं हमारे हमने भी कह डाला सरेआम पड़ते ही नाम हुआ ये अंजाम कि बाकी है अब पकड़ना महज इक [...]
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| June 15, 2005 |
Category:
तन्हा जब होता हूं |
Comment
लहरें किनारों का अपना अहं है… लेकिन लहरों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. ये तो अठखेलियां करते… किनारों के बीच से अपनी ही धुन में बढ़े चले जाते हैं. एक वक्त… एक गहराई… एक समंदर… जहां किनारों का कोई जोर नहीं, सिर्फ लहरें ही लहरें… चारों ओर लहरें… और किनारे? इस भरम में जीते [...]
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| June 13, 2005 |
Category:
तन्हा जब होता हूं |
Comment
न देख इन हाथों को
इस कदर हिकारत से
गर मिल जाए एक पत्थर भी इसे
भगवान बना देते हैं
सजदा करता है तू जिन जवाहरात का
कभी पड़े थे इन्हीं हाथों में एक पत्थर की तरह
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| June 10, 2005 |
Category:
तन्हा जब होता हूं |
Comment
विक्षिप्त है वर्तमान
बता इतिहास किसने किया इसका अपमान
जन्मा तो यह तेरे ही कोख से
था मासूम, अबोध, नादान
आह्लादित था भविष्य देख इसकी मुस्कान
विक्षिप्त है वर्तमान
इतिहास कहता है: